ज़रूर पढ़ें, परब्रह्म का रहस्य जानने के इच्छुक बनाएं गुरु

ज़रूर पढ़ें, परब्रह्म का रहस्य जानने के इच्छुक बनाएं गुरु

गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पाय, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए। गुरु से बड़ा मार्गदर्शक नहीं और गुरु से बड़ा ज्ञानी नहीं। ‘गुरु’ शब्द में ‘गु’ का अर्थ है ‘अंधकार’ और ‘रु’ का अर्थ है ‘प्रकाश’ अर्थात गुरु का शाब्दिक अर्थ हुआ ‘अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला मार्गदर्शक’। सही अर्थों में गुरु वही है जो अपने शिष्यों का मार्गदर्शन करे और जो उचित हो उस ओर शिष्य को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करे। गुरु उसको कहते हैं जो वेद-शास्त्रों का गृणन (उपदेश) करता है अथवा स्तुत होता है। मनुस्मृति में गुरु की परिभाषा निम्नांकित है- निषेकादीनि कार्माणि य: करोति यथाविधि।
सम्भावयति चान्नेन स विप्रो गुरुरुच्यते।

हम गुरु की महिमा को जितना गाएं, कम है। जी हां, कुछ लोगों का ऐसा विचार है कि गुरु की जरूरत ही नहीं है। उनके अनुसार भगवान ही एकमात्र गुरु हैं। किन्तु यह विचार युक्ति संगत एवं शास्त्र सम्मत नहीं है। इस दुनियां की प्रत्यक्ष वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त करने के लिए भी हम किसी ऐसे व्यक्ति का आश्रय लेते हैं जो उसके बारे में अच्छी तरह जानता है। वैसे भी दुनियां के सभी क्षेत्रों में हम गुरु बनाते हैं परन्तु प्रकृति के अतीत जो, भगवद ज्ञान है, उसे प्राप्त करने के लिए गुरु की कोई आवश्यकता नहीं, ऐसा कहना बिल्कुल ही बुद्धिहीन व्यक्ति की बकवास मात्र है। सच तो यह है कि जो कहते हैं कि भगवद् ज्ञान प्राप्त करने के लिए गुरु की कोई आवश्यकता नहीं है उन्हें भगवद् प्राप्ति की कोई चाह ही नहीं है। छान्दोग्य उपनिषद में तो स्पष्ट रूप से कहा गया है कि आचार्यवान् पुरुषो वेद अर्थात् आचरणवान तथा भगवद् अनुभूति प्राप्त आचार्य से दीक्षा लेने वाला तथा सद्गुरु के चरणों में परिपूर्ण श्रद्धा रखने वाला भक्तिमान व्यक्ति ही उस परब्रह्म को जानता है। यहां तक कि गुरु को ग्रहण करने की अत्यावश्यकता की शिक्षा देने के लिए भगवान श्रीकृष्ण, भगवान श्रीगौरसुन्दर एवं भगवान श्रीरामचन्द्र जी ने भगवद् तत्त्व होकर भी गुरु ग्रहण की लीला की। श्रीकृष्ण ने श्री सान्दीपनि मुनि को, श्रीगौरसुन्दरजी ने श्रीईश्वर पुरिपाद जी को तथा श्रीरामचन्द्र जी ने श्रीवशिष्ट मुनि को गुरु रूप से वरण किया था।

कौन होते हैं गुरु

गुरु हिंदू धर्म में एक व्यक्तिगत आध्यात्मिक शिक्षक या निर्देशक होते हैं, जिन्होंने आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि प्राप्त कर ली हो। कम से कम उपनिषदों के समय से भारत में धार्मिक शिक्षा में गुरुकुल पद्धति पर ज़ोर दिया जाता रहा है। पारंपरिक रूप से पुरुष शिष्य गुरुओं के आश्रम में रहते थे और भक्ति तथा आज्ञाकारिता से उनकी सेवा करते थे। भक्ति आंदोलन के उत्थान के साथ, जो इष्ट देवता के प्रति भक्ति पर ज़ोर देता है, गुरु और भी अधिक महत्तवपूर्ण चरित्र बन गए। किसी संप्रदाय के प्रमुख या संस्थापक के रूप में गुरु श्रद्धा के पात्र थे और उन्हें आध्यात्मिक सत्य का मूर्तिमान जीवित रूप माना जाता था। इस प्रकार उन्हें देवता के जैसा सम्मान प्राप्त था। गुरु के प्रति सेवा भाव और आज्ञाकारिता की परंपरा अब भी विद्यमान है।

गुरु का चुनाव

रबीन्द्रनाथ ठाकुर
वीर शैवों में यह है कि प्रत्येक लिंगायत गाँव में एक मठ होता है जो प्रत्येक पाँच प्रारम्भिक मठों से सम्बंधित रहता है। प्रत्येक लिंगायत किसी न किसी मठ से सम्बंधित होता है। प्रत्येक का एक गुरु होता है। ‘जंगम’ इनकी एक जाति है जिसके सदस्य लिंगायतों के गुरु होते हैं।

जब लिंगायत अपने ‘गुरु’ का चुनाव करता है तब एक उत्सव होता है, जिसमें पाँच मठों के महंतों के प्रतिनिधि के रूप में, रखे जाते हैं। चार पात्र वर्गाकार आकृति में एवं एक केंद्र में रखा जाता है। यह केंद्र का पात्र उस लिंगायत के घर जाता है, उस अवसर पर ‘पादोदक’ संस्कार होता है, जिसमें सारा परिवार तथा मित्रमण्डली उपस्थित रहती है। गृहस्वामी द्वारा गुरु की षोडशोपचार पूर्वक पूजा की जाती है।

गुरु का सम्मान
धार्मिक गुरु के प्रति भक्ति की परम्परा भारत में अति प्राचीन है। प्राचीन काल में गुरु की आज्ञा का पालन करना शिष्य का परम धर्म होता था। प्राचीन भारत की शिक्षा प्रणाली में वेदों का ज्ञान व्यक्तिगत रूप से गुरुओं द्वारा मौखिक शिक्षा के माध्यम से शिष्यों को दिया जाता था। गुरु शिष्य का दूसरा पिता माना जाता था एवं प्राकृतिक पिता से भी अधिक आदरणीय था। आधुनिक काल में गुरुसम्मान और भी अधिक बताया गया है। नानक, दादू, राधास्वामी आदि संतों के अनुयायी जिसे एक बार गुरु ग्रहण करते हैं, उसकी बातों को ईश्वरवचन मानते हैं।

बिना गुरु की आज्ञा के कोई हिंदु किसी सम्प्रदाय का सदस्य नहीं हो सकता। प्रथम वह एक जिज्ञासु बनता है। बाद में गुरु उसके कान में एक शुभ बेला में दीक्षा-मंज्ञ पढ़ता है और फिर वह सम्प्रदाय का सदस्य बन जाता है।

गुरु ग्रंथ साहिब
जो विप्र निषक आदि संस्कारों को यथा विधि करता है और अन्न से पोषण करता है वह ‘गुरु’ कहलाता है। इस परिभाषा से पिता प्रथम गुरु है, तत्पश्चात पुरोहित, शिक्षक आदि। मंत्रदाता को भी गुरु कहते हैं।

‘गुरुत्व’ के लिए वर्जित पुरुषों की सूची ‘कालिकापुराण’ में इस प्रकार दी हुई है-
अभिशप्तमपुत्रच्ञ सन्नद्धं कितवं तथा।
क्रियाहीनं कल्पाग्ड़ वामनं गुरुनिन्दकम्॥
सदा मत्सरसंयुक्तं गुरुंत्रेषु वर्जयेत।
गुरुर्मन्त्रस्य मूलं स्यात मूलशद्धौ सदा शुभम्॥

कूर्मपुराण में गुरुवर्ग की एक लम्बी सूची मिलती है:
उपाध्याय: पिता ज्येष्ठभ्राता चैव महीपति:।
मातुल: श्वशुरस्त्राता मातामहपितामहौ॥
बंधुर्ज्येष्ठ: पितृव्यश्च पुंस्येते गुरव: स्मृता:॥
मातामही मातुलानी तथा मातुश्च सोदरा॥
श्वश्रू: पितामही ज्येष्ठा धात्री च गुरव: स्त्रीषु।
इत्युत्को गुरुवर्गोयं मातृत: पितृतो द्विजा:॥

रामकृष्ण परमहंस
इनका शिष्टाचार, आदर और सेवा करने का विधान है।

‘युत्किकल्पतरु’ में अच्छे गुरु के लक्षण निम्नांकित कहे गये हैं-
सदाचार: कुशलधी: सर्वशास्त्रार्थापारग:।
नित्यनैमित्तिकानाञ्च कार्याणां कारक: शुचि:॥
अपर्वमैथुनपुर: पितृदेवार्चने रत:।
गुरुभक्तोजितक्रोधो विप्राणां हितकृत सदा॥
दयावान शीलसम्पन्न: सत्कुलीनो महामति:।
परदारेषु विमुखो दृढसंकल्पको द्विज:॥
अन्यैश्च वैदिकगुणैगुणैर्युक्त: कार्यो गुरुर्नृपै:।
एतैरेव गुणैर्युक्त: पुरोधा: स्यान्महीर्भुजाम्॥
मंत्रगुरु के विशेष लक्षण बतलाये गये हैं:
शांतो दांत: कुलीनश्च विनीत: शुद्धवेशवान्।
शुद्धाचार: सुप्रतिष्ठ: शुचिर्दक्ष: सुबुद्धिमान॥
आश्रामी ध्याननिष्ठश्च मंत्र-तंत्र-विशारद:।
निग्रहानुग्रहे शक्तो गुरुरित्यभिधीयते॥
उद्धर्तुच्ञै व संहतुँ समर्थो ब्राह्माणोत्तम:।
तपस्वी सत्यवादी च गृहस्थो गुरुच्यते॥
गुरु नानक देव
सामान्यत: द्विजाति का गुरु अग्नि, वर्णों का गुरु ब्राह्मण, स्त्रियों का गुरु पति और सबका गुरु अतिथि होता है-

गुरुग्निद्विजातीनां वर्णानां बाह्मणो गुरु:।
पतिरेको गुरु: स्त्रीणां सर्वेषामतिथिर्गुरु:

उपनयनपूर्वक आचार सिखाने वाला तथा वेदाध्ययन कराने वाला आचार्य ही यथार्थत: गुरु है-
उपनीय गुरु: शिष्यं शिक्षयेच्छौचमादित:।
आचारमग्निकार्यञ्चसंध्योपासनमेब च॥
अल्पं वा बहु वा यस्त श्रुतस्योपकरोति य:।
तमपीह गुरुं विद्याच्छु तोपक्रिययातया॥
षटर्त्रिशदाब्दिकं चर्य्यं गुरौ त्रैवेदिकं व्रतम्।
तदर्द्धिकं पादिक वा ग्रहणांतिकमेव वा॥

 

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